मनुष्य के जीवन में कुछ अवस्थाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें केवल जिया जा सकता है, परिभाषित नहीं। प्रेम उनमें से एक है। और जब वही प्रेम एक ऐसे व्यक्ति के जीवन में उतरता है जो समय, उत्तरदायित्वों और संसारगत व्यग्रताओं से घिरा हो, तब वह एक साधारण भाव नहीं रह जाता; वह धीरे-धीरे उसके अस्तित्व का गुप्त व्याकरण बन जाता है।
हमारे समय का मनुष्य विचित्र है। उसके पास संवाद के असंख्य माध्यम हैं, पर संवाद का अवकाश नहीं; उसके पास यात्राएँ हैं, पर ठहराव नहीं; उसके पास परिचितों की भीड़ है, पर आत्मीयता का एकांत नहीं। वह दिन भर दफ़्तरों, सड़कों, बैठकों और स्क्रीन के बीच एक ऐसे चक्रव्यूह में भटकता रहता है, जहाँ से बाहर निकलने की कला उसे स्वयं भी नहीं आती। किंतु इसी चक्रव्यूह के भीतर कहीं प्रेम का एक सूक्ष्म बीज अंकुरित हो जाता है।
प्रेम की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह कभी सुविधाजनक समय में नहीं आता। वह तब आता है जब मनुष्य पहले से ही अनेक दायित्वों के भार तले झुका होता है। प्रेम दरअसल जीवन का अवकाश नहीं, उसका अतिरिक्त बोझ भी नहीं; वह उस बोझ को अर्थ प्रदान करने वाली अदृश्य शक्ति है।
फ़्रांसीसी दार्शनिक सिमोन वेल ने लिखा था कि “ध्यान देना ही प्रेम का सबसे दुर्लभ और शुद्ध रूप है।” व्यस्त आदमी का प्रेम इसी ध्यान में प्रकट होता है। उसके पास लंबी चिट्ठियाँ लिखने का समय नहीं होता, लेकिन दिन भर की अराजकता के बीच अचानक उसे याद आता है कि किसी को हल्का पीला रंग पसंद है, किसी को चाय में चीनी कम चाहिए, किसी को बारिश से डर लगता है। संसार के कोलाहल के बीच किसी एक व्यक्ति की इन सूक्ष्म बातों को बचाए रखना ही प्रेम का सबसे कठिन साधना-पक्ष है।
दरअसल प्रेम की पराकाष्ठा उपस्थिति में नहीं, स्मृति में घटित होती है।
व्यस्त आदमी अपने प्रिय के साथ कम होता है, पर उसके भीतर अधिक। वह दफ़्तर की फ़ाइलों के बीच, मेट्रो की भीड़ में, किसी सड़क पर लाल बत्ती के सामने रुकते हुए, या रात के तीसरे पहर लैपटॉप बंद करते समय भी अपने भीतर किसी की उपस्थिति लिए चलता है। वह ऐसा वृक्ष है जिसके ऊपर संसार की धूल जमी है, किंतु जिसकी जड़ों तक अब भी किसी नदी का जल पहुँचता है।
भारतीय काव्यशास्त्र में विप्रलंभ श्रृंगार अर्थात वियोग का सौंदर्य संयोग से कम महत्त्वपूर्ण नहीं माना गया। संभवतः इसलिए कि अनुपस्थिति मनुष्य को प्रेम की गहराई से परिचित कराती है। जो व्यक्ति दिन भर प्रिय के साथ है, वह प्रेम का उपभोग करता है; जो व्यक्ति दिन भर उससे दूर है, वह प्रेम का निर्वाह करता है।
यहीं व्यस्त आदमी का प्रेम साधारण प्रेम से भिन्न हो जाता है।
वह प्रेम को प्रदर्शन की वस्तु नहीं बनाता। उसके पास सार्वजनिक घोषणाओं का समय नहीं। वह प्रेम को किसी दीपक की तरह अपनी आत्मा के भीतरी कक्ष में रखता है। संसार उसे कर्मठ कहता है, अनुशासित कहता है, सफल कहता है; लेकिन कोई नहीं देख पाता कि उसकी समस्त सक्रियता के भीतर एक व्यक्ति की स्मृति किसी मौन ध्रुवतारे की तरह चमक रही है।
जर्मन दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर ने मनुष्य को “समय में फेंका गया प्राणी” कहा था। व्यस्त आदमी इस फेंके हुए समय का सबसे स्पष्ट प्रतिनिधि है। वह लगातार भविष्य की ओर धकेला जा रहा है अगली मीटिंग, अगली डेडलाइन, अगली उपलब्धि। लेकिन प्रेम उसे बार-बार वर्तमान में लौटाता है। प्रेम कहता है “ठहरो, अभी किसी की आवाज़ याद करनी है; अभी किसी की हँसी को बचाए रखना है।”
यही कारण है कि प्रेम और समय का संबंध सदैव संघर्षपूर्ण रहा है। समय मनुष्य को आगे ले जाना चाहता है; प्रेम उसे किसी एक क्षण में रोक लेना चाहता है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि प्रेम में पड़ा व्यस्त आदमी किसी प्राचीन नगर के उस अंतिम कुएँ जैसा होता है, जिसके चारों ओर आधुनिकता की पूरी इमारत खड़ी हो चुकी हो। लोग उसके पास से गुज़रते हैं, उसकी उपयोगिता पर प्रश्न उठाते हैं, लेकिन वही कुआँ अब भी जल से भरा रहता है। उसकी नमी ही नगर की अंतिम हरियाली को बचाए रखती है।
प्रेम की पराकाष्ठा शायद यहीं है जब प्रेम अधिकार नहीं माँगता, समय नहीं माँगता, प्रतिदान भी नहीं माँगता; केवल मनुष्य के भीतर एक ऐसी करुणा और ऐसी सजगता उत्पन्न कर देता है, जो उसे स्वयं से बड़ा बना देती है।
तब प्रेम किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। वह उसके व्यवहार में उतर आता है, उसकी भाषा में, उसकी दृष्टि में, उसके धैर्य में। वह दूसरों के दुख को अधिक तीव्रता से समझने लगता है। उसकी संवेदना का वृत्त विस्तृत होने लगता है।
और अंततः यही प्रेम का सर्वोच्च रूप है।
क्योंकि प्रेम की पराकाष्ठा किसी को पा लेने में नहीं, बल्कि उसके कारण अपने भीतर एक विशालतर मनुष्य का जन्म होने में है।
व्यस्त आदमी इसलिए प्रेम में नहीं पड़ता कि उसके जीवन में रिक्तता है; वह प्रेम में पड़ता है क्योंकि उसकी समस्त व्यस्तताओं के बीच भी उसकी आत्मा ने अभी तक थककर संवेदनशील होना नहीं छोड़ा है।
और शायद इस पृथ्वी पर इससे अधिक आश्वस्त करने वाली कोई बात नहीं कि मशीनों, समय-सारिणियों और उपलब्धियों से भरे इस युग में भी कोई आदमी कहीं बैठा है अत्यंत व्यस्त, अत्यंत थका हुआ और फिर भी किसी एक व्यक्ति को याद करने का समय उसके पास शेष है।
शायद वही समय वास्तव में उसका अपना समय है। बाक़ी सब संसार का।




2 Comments
कुछ रचनाएँ शब्दों से नहीं, सीधे हृदय से संवाद करती हैं। यह लेख उन्हीं दुर्लभ रचनाओं में से एक है। इसकी प्रशंसा में ‘अप्रतिम’ भी एक साधारण विशेषण-सा लगने लगता है। बहुत ख़ूबसूरत लिखा है आपने!❤️
इसका प्रभाव कुछ ऐसा रहा कि अब तक चार बार पढ़ चुकी हूँ, और हर बार वही भावनाएँ फिर से जीवंत हो उठती हैं।
धन्यवाद। आपके शब्द काफी महत्व रखते है मेरे लिए