मक्का की तरफ बढ़ते हूती ड्रोन को सऊदी अरब द्वारा इंटरसेप्ट किए जाने के बाद एक बार फिर दुनिया की नजर यमन और हूती विद्रोहियों पर है। आखिर हूती कौन हैं, सऊदी अरब से उनका इतना पुराना टकराव क्यों है और इस संघर्ष में ईरान की भूमिका क्या है?
कौन हैं हूती विद्रोही?
हूती यमन का एक सशस्त्र राजनीतिक और धार्मिक आंदोलन है, जिसे आधिकारिक तौर पर अंसार अल्लाह कहा जाता है। यह संगठन मुख्य रूप से यमन के जायदिया शिया समुदाय से जुड़ा है और 1990 के दशक में इसके प्रभाव का विस्तार शुरू हुआ।
समय के साथ हूतियों ने यमन के उत्तरी हिस्सों में अपनी पकड़ मजबूत की और सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। 2014 में उन्होंने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। इसके बाद यमन में राजनीतिक संकट तेजी से गृहयुद्ध में बदल गया।
आज हूती यमन के बड़े हिस्से, जिसमें राजधानी सना भी शामिल है, पर नियंत्रण रखते हैं। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को सऊदी अरब और उसके सहयोगियों का समर्थन मिलता रहा है।
सऊदी अरब से हूतियों की लड़ाई क्यों शुरू हुई?
हूतियों के सना पर कब्जे के बाद यमन में सत्ता संघर्ष तेज हो गया। सऊदी अरब को चिंता थी कि उसकी दक्षिणी सीमा के ठीक पास एक ऐसा सशस्त्र समूह मजबूत हो रहा है, जिसे ईरान का समर्थन हासिल है।
2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में एक अरब गठबंधन ने यमन में सैन्य अभियान शुरू किया। इसका घोषित उद्देश्य हूतियों को पीछे धकेलना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को समर्थन देना था। इसके बाद सऊदी अरब और हूतियों के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों का सिलसिला शुरू हुआ।
यानी आज का संघर्ष अचानक पैदा नहीं हुआ। इसके पीछे करीब एक दशक पुराना यमन युद्ध और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन का विवाद है।
ईरान की भूमिका कहां से आती है?
सऊदी अरब और उसके सहयोगी हूतियों को ईरान के करीब मानते हैं। ईरान पर हूतियों को सैन्य और आर्थिक मदद देने के आरोप लगते रहे हैं। ईरान हूतियों के साथ अपने संबंधों को लेकर अलग-अलग स्तर पर समर्थन जताता रहा है, लेकिन संघर्ष की पूरी तस्वीर को सिर्फ ईरान बनाम सऊदी अरब के रूप में देखना भी पर्याप्त नहीं है।
हूती आंदोलन के अपने स्थानीय राजनीतिक और आर्थिक हित भी हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यमन के भीतर सत्ता, संसाधनों और क्षेत्रीय नियंत्रण की लड़ाई भी इस संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
हूती सऊदी अरब पर हमला क्यों करते हैं?
हूतियों के सऊदी अरब पर हमलों के पीछे कई कारण बताए जाते हैं।
पहला कारण यमन में सऊदी सैन्य हस्तक्षेप है। हूती लंबे समय से सऊदी नेतृत्व वाले अभियान और यमन पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध करते रहे हैं।
दूसरा कारण सऊदी समर्थित यमनी सरकार के साथ संघर्ष है। हूती सऊदी अरब को उस सरकार का प्रमुख समर्थक मानते हैं और इसलिए सऊदी सैन्य तथा आर्थिक ठिकाने उनके निशाने पर आते रहे हैं।
तीसरा कारण क्षेत्रीय दबाव है। हाल के महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के साथ हूतियों की गतिविधियां भी तेज हुई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के जरिए दबाव बनाना क्षेत्रीय शक्ति-संघर्ष का हिस्सा हो सकता है।
तेल और जहाजों पर क्यों पड़ता है असर?
हूती नियंत्रित इलाका लाल सागर के किनारे तक फैला है और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास उनकी मौजूदगी रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। यह यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व के बीच समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण रास्ता है।
हूतियों ने पहले भी लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाया है। 2023 में गाजा युद्ध के बाद उन्होंने इजरायल से जुड़े जहाजों पर हमले शुरू किए थे। 2026 में सऊदी अरब के खिलाफ उनकी गतिविधियां बढ़ने के बाद तेल और समुद्री व्यापार को लेकर चिंता और बढ़ गई है।
2026 में फिर क्यों बढ़ गया तनाव?
2026 में अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष ने पूरे क्षेत्र की स्थिति को और जटिल बना दिया। इसके बाद हूतियों और सऊदी समर्थित यमनी बलों के बीच भी हिंसा बढ़ी।
जुलाई में हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी की घोषणा की। इसके बाद सऊदी ठिकानों, ऊर्जा ढांचे और जहाजों पर हमलों की खबरें सामने आईं। अगस्त और सितंबर में भी दोनों पक्षों के बीच तनाव और हमले जारी रहे।
सितंबर में हूती हमलों के बाद सऊदी अरब ने जवाबी कार्रवाई की और यमन में हूती ठिकानों को निशाना बनाया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, नए संघर्ष के कारण यमन में एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं।
मक्का की तरफ ड्रोन पहुंचने से क्यों बढ़ी चिंता?
हालिया घटनाक्रम में सबसे संवेदनशील मामला मक्का के आसपास का है। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, एक हूती ड्रोन मक्का की दिशा में बढ़ रहा था, जिसे प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ही इंटरसेप्ट कर नष्ट कर दिया गया।
सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने मक्का और पवित्र स्थलों की सुरक्षा को अपनी ‘रेड लाइन’ बताया है। हालांकि, हूतियों ने मक्का या किसी धार्मिक स्थल को निशाना बनाने से इनकार किया है। इसलिए ड्रोन के मक्का को निशाना बनाने के दावे को फिलहाल सऊदी पक्ष के दावे और हूती पक्ष के इनकार के संदर्भ में देखना जरूरी है।
सिर्फ सऊदी अरब नहीं, पूरी दुनिया के लिए क्यों अहम है यमन?
यमन का संघर्ष अब सिर्फ दो पक्षों के बीच चलने वाला स्थानीय युद्ध नहीं रह गया है। इसकी वजह है यमन की भौगोलिक स्थिति।
एक तरफ लाल सागर और बाब-अल-मंदेब है, तो दूसरी तरफ खाड़ी क्षेत्र और दुनिया की महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्ति लाइनें हैं। अगर यहां समुद्री यातायात लंबे समय तक बाधित होता है तो इसका असर तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि हूती-सऊदी संघर्ष को अब यमन की सीमा से बाहर निकलकर पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजार के संदर्भ में देखा जा रहा है।
आगे क्या?
फिलहाल यमन में संघर्ष का भविष्य अनिश्चित है। हूती सऊदी समर्थित ताकतों के खिलाफ अपनी सैन्य क्षमता का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि सऊदी अरब अपनी सीमाओं, ऊर्जा ढांचे और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यमन का स्थानीय सत्ता संघर्ष अब ईरान-सऊदी प्रतिद्वंद्विता, अमेरिका-ईरान तनाव और लाल सागर के समुद्री व्यापार से जुड़ चुका है। यही वजह है कि यमन में होने वाली किसी भी नई सैन्य कार्रवाई का असर पूरे क्षेत्र और उससे आगे तक दिखाई दे सकता है।


