कभी-कभी लगता है कि देश लोकतंत्र नहीं, एक डरपोक आत्मा की आत्मकथा में तब्दील हो चुका है। सत्ता की गद्दी पर बैठा व्यक्ति जनता से नहीं, सवालों से डरता है। वह प्रधानमंत्री कम, एक टेलीप्रॉम्प्टर-योगी ज्यादा लगता है जो तब तक बोलेगा जब तक सामने भीड़ हो, कैमरा चमक रहा हो, और कोई असुविधाजनक सवाल हवा में न मंडरा रहा हो।
लेकिन जैसे ही देश में कोई संकट आता है तो ऑक्सीजन की कमी हो या लद्दाख में चीनी सेना की घुसपैठ, अर्थव्यवस्था की टांग टूटे या किसानों की हड्डियाँ वैसे ही ये “56 इंच” सिकुड़कर 5.6 इंच रह जाता है। मोदी जी की चुप्पी अब एक राजनीतिक रणनीति नहीं, एक राष्ट्रव्यापी भगोड़ा संस्कृति बन चुकी है। उनका मौन अब मौन नहीं, एक राष्ट्रीय परिहास है।
जब-जब देश को एक स्पष्ट नेतृत्व की जरूरत पड़ी, तब-तब देश को एक गूंगे राजा की झलक मिली, जो सत्ता की अट्टालिका में छुपकर बैठा रहा। बाहर न आया, न माफी मांगी, न स्पष्टीकरण दिया। यह नेतृत्व नहीं, कायरता की जीवित प्रतिमा है।
क्या यही है “न्यू इंडिया”?
यहाँ सत्ता बोलती नहीं, धमकाती है। संवाद नहीं करती, प्रवचन देती है। यहां सवाल पूछना अपराध है, और चुप्पी ‘राजनीतिक योग’ बन चुकी है। प्रधानमंत्री को जनता से डर लगता है, एक डरा हुआ राजा, जो अपने ही महल की दीवारों में कैद है, और मंत्रियों की सेना “जय श्री नरेंद्र!” के जयकारे लगाकर उनकी रीढ़हीनता को ढंकने की कोशिश करती है।
चुप्पी एक अपराध है, जब जनता दम तोड़ रही हो। कोविड की दूसरी लहर में जब लोग ऑक्सीजन के लिए मर रहे थे, तब प्रधानमंत्री के कैमरे बंद थे। क्या वे ध्यानमग्न थे या जिम्मेदारी के शव को आग दे रहे थे? किसानों ने महीनों दिल्ली के बाहर डेरा डाला, लेकिन प्रधानमंत्री ने एक बार भी जाकर सीधे बात नहीं की। यह संवादहीनता नहीं, यह जनता के चेहरे पर थूका गया मौन है।
संसद में कहाँ हैं प्रधान सेवक?
‘ऑपरेशन सिंदूर’ हो या देश की सुरक्षा नीति संसद में जब सवाल उठते हैं, तो कुर्सियाँ खाली होती हैं। प्रधानमंत्री की गैरहाजिरी अब एक आदत बन गई है। एक ऐसा प्रधान सेवक, जो केवल राजा की तरह दीवारों में कैद रहता है, केवल चुनाव के समय ‘मन की बात’ करता है, लेकिन जनता की बात सुनने में बहरेपन का चश्मा लगा लेता है।
ये कैसी सरकार है जो बोलने से डरती है? ये कैसी सत्ता है जो आलोचना से घबराकर मीडिया की जीभ काट देती है, और पत्रकारों की कलम तोड़ देती है? ये कैसी लोकतंत्र की प्रतिमा है जिसमें संवाद का ह्रास इतना भयावह है कि जनता अब सवाल पूछने से पहले जेल की गिनती करने लगती है?
स्मार्ट सिटी या स्मार्ट धोखा?
100 स्मार्ट सिटी बनाने का वादा करके 1.5 लाख करोड़ झोंक दिए गए, लेकिन शहर वैसे ही गंदगी और बदहाली में तड़प रहे हैं। लगता है ये स्मार्ट सिटी नहीं, स्मार्ट जुमला योजना थी। सड़कें टूटी, सीवर उफनाते, बाढ़ में डूबते लोग और ऊपर से सरकार का गर्व भरा घोषणापत्र! अगर यही स्मार्ट सिटी है, तो फिर मूर्खता की परिभाषा पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।
चुनाव आयोग और मीडिया: सत्ता की पालतू सेना
मीडिया अब सत्ता का चमचा बन चुका है, और चुनाव आयोग सत्ता की इलेक्शन मैनेजमेंट एजेंसी। राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ वाले बयान को ‘भ्रामक’ बताकर चुनाव आयोग ने निष्पक्षता की लाश को अंतिम संस्कार तक दिए बिना छोड़ दिया। प्रेस की स्वतंत्रता अब केवल रिपोर्ट कार्ड में बची है असल में हर चैनल सत्ता की गोद में बैठकर चाटुकारिता का अखाड़ा बन चुका है।
लोकतंत्र या आत्मवंचना?
अब यह लोकतंत्र नहीं, एक जनता-विहीन प्रहसन है, जिसमें राजा अकेले अभिनय कर रहा है, और श्रोताओं को बैठकर ताली बजानी है। सत्ता की यह चुप्पी कोई नीति नहीं, डरपोक मानसिकता का मुखौटा है। मोदी सरकार की यह संवाद शैली दरअसल राजनीतिक पलायनवाद है, जिम्मेदारियों से भागने की कला, और जनहित से दूर भागने का तमाशा।
निष्कर्ष:
प्रधानमंत्री जी, अगर आप बोल नहीं सकते, तो शासन करना छोड़िए। देश को ऐसे “नेता” की जरूरत नहीं जो माइक पर शेर हो और संसद में चूहा। जनता अब भाषण नहीं, जवाब मांगती है। और आप जैसे लोग जब सवालों से भागते हैं, तो जनता को समझ आ जाता है कि आप सत्ता के नहीं, डर के प्रतिनिधि हैं। आपका मौन अब साधना नहीं, संविधान का अपमान है। और इतिहास बहुत निर्दयी होता है। वह चुप्पियों को नहीं, कायरताओं को याद रखता है।


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A much needed article. The jabs, the questions are on point. Our prime minister really knows how to give long speeches – I just wish he knew how to fulfil and implement the promises and schemes he talks about. How is he going to ensure accountability for the promises he made when he chooses silence everytime a crucial question is being asked.