सोमवार को भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण आया जब सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली और भारत की पहली खुले तौर पर क्वियर सांसद बन गईं। यह उपलब्धि न केवल राजनीति में बल्कि समलैंगिक अधिकारों के आंदोलन में भी मील का पत्थर साबित हुई है।
मेनका गुरुस्वामी को ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने राज्यसभा के लिए नामांकित किया था। उनके साथ पश्चिम बंगाल के मंत्री बाबुल सुप्रियो, पूर्व बंगाल DGP राजीव कुमार और अभिनेत्री कोएल मलिक भी उम्मीदवार थे।
मेनाका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता होने के साथ-साथ भारत में LGBTQ+ अधिकारों की प्रमुख आवाज़ों में से एक हैं। वह उन वकीलों में शामिल थीं जिन्होंने 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को चुनौती दी और समान-लिंग संबंधों को अपराध मानने वाले कानून को निरस्त करवाया। यह भारत में LGBTQ+ समुदाय के लिए एक ऐतिहासिक जीत थी।
“क्वियर” शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है जिनकी यौनिक प्रवृत्ति, लिंग पहचान या व्यक्तित्व पारंपरिक धाराओं में नहीं आता। इसमें समलैंगिक, उभयलिंगी, ट्रांसजेंडर और अन्य गैर-पारंपरिक पहचान वाले लोग शामिल हैं। मेनका गर्व से खुद को क्वीर के रूप में पहचानती हैं।
किरण मनराल की किताब Rising: 30 Women Who Changed India के अनुसार, मेनका ने 1997 में भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के अधीन अपने करियर की शुरुआत की। उन्होंने प्रारंभ में संविधान और मुकदमेबाजी के मामलों पर ध्यान केंद्रित किया। इसके बाद उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से BCL और हार्वर्ड विश्वविद्यालय से LLM किया, और 2001 में भारत लौटकर नई दिल्ली में बस गईं।
2019 में उन्हें Foreign Policy मैगज़ीन द्वारा दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली ग्लोबल थिंकरों में शामिल किया गया। इसके अलावा, उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हुए I-PAC के कार्यालयों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी लड़ी।
मेनाका गुरुस्वामी का राज्यसभा में शपथ ग्रहण न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि यह भारत में विविधता, समानता और LGBTQ+ अधिकारों के सम्मान की दिशा में एक बड़ा संदेश है। उनका अनुभव और नेतृत्व नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा और बदलाव की प्रतीक बन चुका है।

