वाराणसी: काशी की गलियों में हर साल की तरह इस बार भी मानिकर्णिका और हरीशचंद्र घाट पर मसान होली का भव्य आयोजन हुआ। इस उत्सव की खासियत यह है कि श्रद्धालु एक-दूसरे पर चिता की राख लगाकर होली की परंपरा निभाते हैं।
इस वर्ष कई श्रद्धालु गण के वेश में नजर आए शिव के भक्त और साथी, जिन्होंने पूरे शरीर को राख से ढक लिया था। वे पारंपरिक भजनों और होली के लोकप्रिय गीतों पर नाचते हुए माहौल में उत्साह और ऊर्जा भर रहे थे।
मसान होली का आध्यात्मिक महत्व
मसान होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह जीवन और मृत्यु के चक्र की याद दिलाने वाला अनूठा पर्व है। राख लगाना मृत्यु को स्वीकार करने और पुनर्जन्म के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यह परंपरा काशी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को विशेष रूप से प्रदर्शित करती है।
श्रद्धालुओं और पर्यटकों की भागीदारी
इस वर्ष आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। स्थानीय निवासी और दूर-दूर से आए पर्यटक, दोनों ने मिलकर इस अद्वितीय पर्व को और जीवंत बनाया। राख और रंगों की बारिश के बीच लोग एक-दूसरे को गले मिलते और होली की खुशियाँ बांटते नजर आए।
मसान होली में भावनात्मक समर्पण और सांसारिक निर्लिप्तता का संगम देखने को मिलता है। पारंपरिक नृत्य और भजन पूरे घाट क्षेत्र में उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार कर रहे थे।
वाराणसी की यह परंपरा दर्शाती है कि यहाँ जीवन और मृत्यु दोनों का उत्सव भाव और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, और यह शहर की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है।

