“आलोचना का काम लेखक की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि साहित्य के भीतर छिपे सत्य को सामने लाना है।” यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था, बल्कि नामवर सिंह के पूरे जीवन का दर्शन था।
हिंदी साहित्य में अगर प्रेमचंद कहानी के शिखर हैं, महादेवी वर्मा संवेदना की आवाज़ हैं और रामधारी सिंह दिनकर ओज के कवि हैं, तो आलोचना की दुनिया में जिस नाम ने सबसे गहरी छाप छोड़ी, वह था नामवर सिंह।
28 जुलाई 1926… उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के जीयनपुर गांव में एक बच्चे का जन्म हुआ। किसी ने नहीं सोचा था कि यही बच्चा आगे चलकर हिंदी आलोचना की दिशा बदल देगा। वह सिर्फ किताबें नहीं पढ़ेगा, बल्कि लेखकों को भी पढ़ना सिखाएगा।
नामवर सिंह का बचपन साधारण ग्रामीण परिवेश में बीता। आर्थिक सुविधाएं बहुत नहीं थीं, लेकिन पढ़ने की भूख असाधारण थी। गांव की पाठशाला से शुरू हुआ सफर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तक पहुंचा। यहीं उन्हें हिंदी के महान विद्वान आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का सान्निध्य मिला। बाद में नामवर सिंह कहा करते थे कि उन्होंने सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि अपने गुरुओं से सोचने का तरीका सीखा।
उन्होंने एम.ए. और पीएचडी की पढ़ाई की। उनका शोध विषय था “हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान”। यह बताता है कि उनकी रुचि केवल समकालीन साहित्य तक सीमित नहीं थी, बल्कि भाषा की जड़ों तक थी। लेकिन नामवर सिंह सिर्फ विश्वविद्यालयों के विद्वान बनकर नहीं रह गए। उन्होंने अध्यापन किया, शोध किया, लिखा, बहस की और सबसे बढ़कर साहित्य को जीवंत बनाया। जब हिंदी साहित्य में नई कहानी, नई कविता और आधुनिकता की बहस चल रही थी, तब नामवर सिंह सबसे मुखर आलोचक बनकर सामने आए।
उनकी सबसे चर्चित किताब “कविता के नए प्रतिमान” ने हिंदी आलोचना का चेहरा बदल दिया। इस पुस्तक के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। इस किताब में उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या कविता को पुराने मानदंडों से ही परखा जाएगा, या हर नए दौर की कविता अपने नए प्रतिमान खुद बनाएगी? यही नामवर सिंह की सबसे बड़ी ताकत थी। वे परंपरा का सम्मान करते थे, लेकिन परंपरा को अंतिम सत्य नहीं मानते थे। उनका एक प्रसिद्ध कथन है “परंपरा वह नहीं जो हमें बांध दे, परंपरा वह है जो हमें आगे बढ़ने की शक्ति दे।” नामवर सिंह की आलोचना का सबसे बड़ा गुण यह था कि वे लेखक की नहीं, रचना की बात करते थे। उनके लिए लेखक का कद कभी निर्णायक नहीं था।
वे कबीर पर भी उतनी ही गंभीरता से लिखते थे, जितनी मुक्तिबोध पर। वे तुलसीदास को भी पढ़ते थे और धूमिल को भी। उनके लिए साहित्य समय से संवाद करने का माध्यम था। वह अक्सर कहा करते थे “साहित्य जीवन से बड़ा नहीं हो सकता, क्योंकि साहित्य का जन्म ही जीवन से होता है।” यही कारण था कि उनकी आलोचना किताबों तक सीमित नहीं रही। उनके व्याख्यान सुनने के लिए विश्वविद्यालयों के सभागार भर जाते थे।
लोग कहते थे कि अगर नामवर सिंह बोल रहे हों, तो उन्हें सुनना किसी किताब को पढ़ने जैसा नहीं, बल्कि साहित्य को जीने जैसा अनुभव होता है। उनकी भाषा कठिन नहीं होती थी। वे विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं करते थे। बल्कि जटिल से जटिल साहित्यिक विचार को भी इतने सहज ढंग से समझाते थे कि सामान्य पाठक भी उसे समझ सके। यही वजह थी कि नामवर सिंह सिर्फ आलोचकों के आलोचक नहीं बने, बल्कि छात्रों, शोधार्थियों और युवा लेखकों के सबसे प्रिय वक्ता भी बने। लेकिन जितनी प्रशंसा उन्हें मिली, उतने ही विवाद भी उनके साथ जुड़े। कई लोग कहते थे कि नामवर सिंह की राय ही हिंदी साहित्य में अंतिम राय बन जाती है। अगर उन्होंने किसी लेखक की प्रशंसा कर दी तो वह रातों-रात चर्चित हो जाता था। और अगर किसी रचना को उन्होंने कमजोर बता दिया, तो उस पर लंबी बहस शुरू हो जाती थी। यही प्रभाव धीरे-धीरे उन्हें हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा निर्णायक बना रहा था।
लेकिन नामवर सिंह खुद इस छवि से हमेशा असहज रहे। वे कहते थे “आलोचक न्यायाधीश नहीं होता। उसका काम फैसला सुनाना नहीं, बहस शुरू करना होता है।” और शायद यही वजह थी कि उन्होंने कभी आलोचना को अंतिम सत्य नहीं माना। उनकी हर किताब, हर व्याख्यान और हर बहस में एक चीज़ समान दिखाई देती है प्रश्न पूछने की आदत। वे उत्तर देने से पहले प्रश्न खड़े करते थे। यही उन्हें दूसरे आलोचकों से अलग बनाता है। लेकिन समय के साथ हिंदी साहित्य केवल विचारों की दुनिया नहीं रहा। उसमें वैचारिक खेमेबंदी भी बढ़ने लगी। लेखक समूहों में बंटने लगे। पत्रिकाएं विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने लगीं। और धीरे-धीरे हिंदी साहित्य में तीन ऐसे प्रभावशाली ध्रुव उभरे, जिनकी चर्चा आज भी होती है।
पहला ध्रुव था नामवर सिंह।
दूसरा राजेंद्र यादव।
और तीसरा अशोक वाजपेयी।
हालांकि ये कभी घोषित संगठन या औपचारिक गुट नहीं थे, लेकिन हिंदी साहित्य की दुनिया में यह माना जाने लगा कि लेखकों, कवियों और आलोचकों का झुकाव इन तीनों प्रभावशाली केंद्रों में से किसी एक की ओर दिखाई देता है।
यहीं से हिंदी साहित्य की सबसे दिलचस्प और सबसे विवादास्पद कहानी शुरू होती है…
यह कोई घोषित संगठन नहीं थे, न ही इनका कोई संविधान था। लेकिन साहित्यिक दुनिया में यह माना जाने लगा कि लेखक, कवि और आलोचक किसी-न-किसी वैचारिक ध्रुव के आसपास दिखाई देते हैं। नामवर सिंह आलोचना के सबसे प्रभावशाली चेहरे थे। राजेंद्र यादव ने अपनी पत्रिका ‘हंस’ के माध्यम से नई कहानी, स्त्री-विमर्श और दलित विमर्श को नई ऊर्जा दी। वहीं अशोक वाजपेयी ने ‘पूर्वग्रह’ जैसी पत्रिकाओं और भारत भवन जैसे सांस्कृतिक संस्थानों के जरिए आधुनिक साहित्य, कविता और कला को एक नई दिशा देने का प्रयास किया। इन तीनों के बीच वैचारिक मतभेद भी थे, बहसें भी थीं और कई बार तीखे विवाद भी। लेकिन यही बहसें हिंदी साहित्य को जीवंत बनाती थीं। नामवर सिंह का मानना था कि साहित्य में सबसे बड़ा खतरा विचारों का नहीं, विचारों के बंद हो जाने का है।
वे कहा करते थे “जहां बहस खत्म होती है, वहां साहित्य भी धीरे-धीरे मरने लगता है।” शायद यही कारण था कि वे हर मंच पर सवाल पूछते थे। वे सहमति से ज्यादा असहमति को महत्व देते थे। एक बार उन्होंने कहा था “मैं अपने शिष्यों से यही चाहता हूं कि वे मुझसे सहमत नहीं, मुझसे असहमत होने की क्षमता रखें।” यह एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक बुद्धिजीवी की आवाज़ थी। लेकिन जितनी उनकी प्रशंसा हुई, उतनी ही आलोचना भी। कुछ लोगों का आरोप था कि नामवर सिंह की पसंद और नापसंद से लेखकों की प्रतिष्ठा तय होने लगी थी। कहा जाता था कि अगर नामवर सिंह ने किसी लेखक की तारीफ कर दी, तो उसकी चर्चा पूरे हिंदी जगत में होने लगती थी। और अगर उन्होंने किसी रचना की आलोचना कर दी, तो उस पर लंबी बहस छिड़ जाती थी। इन आरोपों पर नामवर सिंह मुस्कुराकर कहते थे “अगर आलोचना से किसी को असुविधा नहीं हुई, तो समझिए आलोचना हुई ही नहीं।”
उनकी आलोचना कभी-कभी इतनी तीखी होती थी कि लेखक नाराज़ हो जाते थे। लेकिन वे व्यक्तिगत हमला नहीं करते थे। वे हमेशा रचना पर बात करते थे। उनका एक और प्रसिद्ध कथन था “रचना लेखक से बड़ी होती है। लेखक मर जाता है, रचना जीवित रहती है।” नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना को केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने उसे आम पाठकों तक पहुंचाया। उनके व्याख्यान आज भी यूट्यूब पर लाखों लोग सुनते हैं। लोग कहते हैं कि वे बिना किसी कागज़ के दो-दो घंटे बोलते थे और श्रोताओं को ऐसा लगता था जैसे कोई इतिहास, दर्शन और साहित्य एक साथ बह रहा हो। वे कबीर पर बोलते थे तो लगता था जैसे कबीर आज भी हमारे बीच खड़े हों। वे तुलसी की बात करते थे तो लगता था कि रामचरितमानस सिर्फ धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि समाज का दस्तावेज़ है। वे मुक्तिबोध को पढ़ते थे तो उनके भीतर छिपी बेचैनी को सामने ले आते थे। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। वे सिर्फ किताबें नहीं पढ़ते थे… वे समय को पढ़ते थे।
19 फ़रवरी 2019… दिल्ली में नामवर सिंह ने अंतिम सांस ली। लेकिन उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था। हिंदी आलोचना का एक पूरा युग समाप्त हो गया। उनके निधन पर देशभर के साहित्यकारों ने कहा कि हिंदी ने अपना सबसे बड़ा आलोचक खो दिया है। लेकिन सच यह भी है कि आलोचक कभी पूरी तरह मरते नहीं। वे अपनी किताबों में, अपने व्याख्यानों में और अपने सवालों में जीवित रहते हैं। आज भी जब हिंदी साहित्य में किसी नई किताब पर बहस होती है… जब किसी कविता की व्याख्या होती है… जब आलोचना की भूमिका पर सवाल उठता है… तो कहीं-न-कहीं नामवर सिंह की आवाज़ सुनाई देती है। उन्होंने एक बार कहा था “साहित्य हमें बेहतर मनुष्य बनाता है। अगर वह हमें बेहतर इंसान नहीं बना रहा, तो हमें साहित्य को फिर से पढ़ने की जरूरत है।” शायद यही नामवर सिंह की सबसे बड़ी विरासत है। उन्होंने हिंदी साहित्य को सिर्फ पढ़ना नहीं सिखाया… उन्होंने उसे समझना सिखाया। उन्होंने सिर्फ लेखकों का मूल्यांकन नहीं किया… उन्होंने पाठकों को सोचने की आदत दी। आज, उनके जन्मदिन पर उन्हें याद करना सिर्फ एक महान आलोचक को श्रद्धांजलि देना नहीं है… बल्कि उस परंपरा को याद करना है, जिसमें सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि ज्ञान की पहली शर्त माना जाता है।
क्योंकि नामवर सिंह कहा करते थे “साहित्य में अंतिम शब्द कभी नहीं होता। हर पीढ़ी अपना नया अर्थ खोजती है।” और शायद इसी एक वाक्य में उनका पूरा जीवन समाया हुआ है। अगर हिंदी साहित्य एक विशाल वृक्ष है, तो नामवर सिंह उसकी सबसे मजबूत शाखाओं में से एक थे जिसने नई पीढ़ियों को छाया भी दी, दिशा भी दी और सबसे बढ़कर… सोचने का साहस दिया।



