शायद किसी संबंध को समझने की कोशिश में सबसे कठिन काम यही है अपनी अनुभूति को सच मानना, लेकिन अपनी व्याख्या को अंतिम सत्य न समझना। दुखों के संग्रहालय में तुम्हारी दबी हुई आवाज़ रिश्तों, स्मृति, अकेलेपन और दूसरे की स्वतंत्रता पर एक साहित्यिक चिंतन।
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‘चाँदपुर की चंदा’ को लोकप्रियता और लोक-स्मृति के बने-बनाए घेरे से बाहर निकालकर उसके यथार्थपरक सामाजिक संदर्भों में देखने की कोशिश यह लेख करता है। रचना में उपस्थित स्मृतियों, ग्रामीण जीवन और बदलते सामाजिक यथार्थ के अंतर्विरोधों के माध्यम से चंदा के चरित्र और उसकी दुनिया का नए सिरे से मूल्यांकन किया गया है।
“आलोचना का काम लेखक की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि साहित्य के भीतर छिपे सत्य को सामने लाना है।” यह सिर्फ…

