हिन्दी सिनेमा के आकाश पर यदि किसी नक्षत्र ने अपनी ज्योति से दर्शकों के अंतःकरण को एक साथ आलोकित और आर्द्र किया है, तो वह मधुबाला हैं। एक ऐसा नाम, जो उच्चरित होते ही केवल सौंदर्य की प्रतिमा नहीं, बल्कि करुणा, अव्यक्त वेदना और अनाम त्याग की गूंज बनकर हृदय में उतरता है। वह मात्र अभिनेत्री नहीं थीं, वह भारतीय जन-मन के स्वप्नलोक की वह छवि थी, जिसमें मुस्कान के अधरों पर अनश्वर विषाद का कंपन निरंतर थिरकता रहा। मुमताज़ जहाँ बेगम देहलवी से मधुबाला बनने की यात्रा, दरअसल एक बालिका के कंधों पर समय की निर्दय व्यवस्था का बोझ है। नौ वर्ष की अल्पायु में जब उन्होंने चलचित्रों की कृत्रिम रोशनियों के बीच अपने बचपन को गिरवी रखा, तब शायद उन्हे यह भान भी न रहा होगा कि यह उद्योग उनकी हँसी का उपभोग करेगा और उनकी निस्तब्ध रात्रियों का कोई लेखा नहीं रखेगा। कैमरे की तीक्ष्ण दृष्टि ने उनके मुख-मंडल पर आभा खोजी, पर उस बालिका के भीतर पलते भय, असुरक्षा और अनिश्चित भविष्य को किसने देखा?
सिनेमा के इतिहास में अनेक अभिनेत्रियाँ आईं कुछ ने अभिनय से, कुछ ने व्यक्तित्व से और कुछ ने विवादों से अपना स्थान सुरक्षित किया। किंतु मधुबाला की उपस्थिति में एक अलभ्य सम्मोहन था। एक ऐसा सम्मोहन, जिसमें सौंदर्य की चमक से अधिक आत्मा की थरथराहट थी। जब उसने Mahal में रहस्य की धुंध के बीच अपनी आँखों से संवाद किया, तब दर्शकों ने केवल एक अभिनेत्री नहीं देखी, उन्होंने एक ऐसे चेहरे को देखा, जो मानो किसी अधूरी कथा का शोकगीत हो। उस फिल्म ने उन्हे प्रसिद्धि दी, पर प्रसिद्धि के साथ वह एकाकीपन भी आया, जो केवल भीड़ के मध्य खड़े व्यक्ति को प्राप्त होता है। मशहूर अदाकारा मीनू मुमताज़ कहती थीं की उनकी त्वचा इतनी गोरी थी कि अगर वो पान खाएं तो उसका लाल रास गले में जाते हुए देखा जा सकता था।
उनका प्रेम विशेषतः Dilip Kumar के साथ भारतीय सिनेमा की सबसे करुण प्रेमकथाओं में गिना जाता है। यह प्रेम केवल दो व्यक्तियों का आकर्षण नहीं था… यह दो संवेदनशील आत्माओं का संवाद था, जिसे परिस्थितियों, अहंकारों और पारिवारिक दवाबों ने विखंडित कर दिया। कहते हैं कि अधूरा प्रेम मनुष्य को भीतर से रिक्त कर देता है। मधुबाला के अभिनय में जो अथाह पीड़ा दिखाई देती है, वह संभवतः उसी रिक्तता की प्रतिध्वनि थी।
जब उन्होंने Mughal-e-Azam में अनारकली का रूप धारण किया, तब वह केवल परदे पर कैद एक प्रेमिका नहीं थी; वह स्वयं अपने जीवन की अनारकली थी प्रेम के लिए समर्पित, पर नियति के कारागार में बंद। “प्यार किया तो डरना क्या” का साहसिक उद्घोष जब उसके अधरों से निकला, तो वह संवाद से अधिक आत्मस्वीकृति प्रतीत हुआ मानो वह समूचे समाज से कह रही हो कि प्रेम अपराध नहीं, अस्तित्व की अनिवार्यता है। किंतु विडंबना देखिए जिस स्त्री ने परदे पर प्रेम के लिए साम्राज्य को चुनौती दी, वही वास्तविक जीवन में अपने ही अंतर्द्वंद्वों और सामाजिक मर्यादाओं की दीवारों में घिर गई। उनका विवाह Kishore Kumar से हुआ एक ऐसा संबंध, जिसमें करुणा अधिक थी, उल्लास कम। किशोर कुमार ने उसे सहारा दिया, पर बीमारी ने उनके वैवाहिक जीवन को कभी पूर्णता नहीं लेने दी। मधुबाला के हृदय में जन्मजात छिद्र था। एक चिकित्सकीय तथ्य, किंतु उससे कहीं अधिक एक प्रतीक। उनका हृदय सचमुच छिद्रित था, रक्तस्राव से नहीं, अपूर्णताओं से। वह मुस्कुराती रहीं, पर भीतर कहीं जीवन का रक्तसंचार धीमा पड़ता गया।
बीमारी की जानकारी उन्हें प्रारंभ से थी। चिकित्सकों ने चेतावनी दी थी कि अधिक श्रम, अधिक तनाव, अधिक परिश्रम सब उनके लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। पर क्या कलाकार अपने कर्म से विरत हो सकता है? उन्होंने अभिनय नहीं छोड़ा। वह सेट पर आती रहीं, प्रकाश के नीचे खड़ी रहीं, संवाद बोलती रहीं मानो हर दृश्य उनके जीवन का अंतिम दृश्य हो। यह केवल पेशेवर प्रतिबद्धता नहीं थी; यह उस स्त्री का साहस था, जिसने अपने अवसान को जानते हुए भी अपने दर्शकों से मुस्कान नहीं छीनी। 1969 की उस फरवरी में, जब वह मात्र छत्तीस वर्ष की आयु में इस संसार से विदा हुईं, तब भारतीय सिनेमा ने केवल एक अभिनेत्री नहीं खोई; उसने अपनी संवेदना का एक आयाम खो दिया। उनके जाने के बाद भी उसके चित्र जीवित रहे, कैलेंडरों पर, दीवारों पर, स्मृतियों में। पर क्या किसी चित्र में वह थकान दिखती है, जो लंबी रातों के बाद उनकी आँखों में उतरती थी? क्या किसी गीत में वह सिसकी सुनाई देती है, जो अनसुने प्रेम और असाध्य रोग के बीच दबकर रह गई? मधुबाला का जीवन हमें एक असहज प्रश्न के सामने खड़ा करता है। क्या सौंदर्य वरदान है या अभिशाप? जिस सौंदर्य ने उन्हें विश्व-प्रसिद्ध किया, वही सौंदर्य उनकी निजता का अपहरण भी करता रहा। लोग उनके चेहरे पर मोहित हुए, पर उनके भीतर के मनुष्य को कितनों ने जाना? वह हँसती थी, पर उसकी हँसी में एक नाजुक कंपन था, जैसे कोई काँच की चूड़ी हर क्षण टूटने के भय में झनक रही हो।
आज जब हम उनके दृश्य पुनः देखते हैं, तो केवल श्वेत-श्याम फ्रेम नहीं देखते; हम एक समय का स्पंदन देखते हैं। एक ऐसी स्त्री का, जिसने जीवन को पूरे मनोयोग से जिया, भले ही जीवन ने उसे पूर्ण अवसर न दिया। उनकी आँखों में एक अजीब-सी पारदर्शिता थी। जैसे वह दर्शकों से कह रहीं हो, “मैं यहाँ हूँ, पर अधिक समय के लिए नहीं।” उनकी स्मृति किसी स्मारक की तरह कठोर नहीं, बल्कि किसी राग की तरह तरल है। जो सुनते ही हृदय में एक अव्यक्त वेदना जगा देता है। मधुबाला भारतीय सिनेमा की ‘ट्रेजिक ब्यूटी’ नहीं थीं; वह उस सभ्यता की प्रतिनिधि थीं, जहाँ स्त्री अपने कर्तव्य, प्रेम और पीड़ा के बीच संतुलन साधते-साधते स्वयं को विस्मृत कर देती है। शायद इसीलिए उसका नाम लेते ही आँखें नम हो जाती हैं। वह चली गई, पर अपनी मुस्कान का ऋण हम पर छोड़ गई। वह मुस्कान, जिसमें अनंत पीड़ा का शमन था; वह दृष्टि, जिसमें असंख्य अपूर्ण स्वप्नों की परछाई थी। मधुबाला एक चेहरा नहीं, एक अधूरा गीत है। एक ऐसी धुन, जो कभी पूर्ण नहीं हुई, पर जिसकी गूँज आज भी भारतीय मानस में अनवरत बजती है।



