नई दिल्ली: पंजाब की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हिंदू मतदाताओं को लेकर राजनीतिक दलों की रणनीति बदलती नजर आ रही है। आम आदमी पार्टी (AAP) ने धार्मिक और मंदिर से जुड़े मुद्दों पर अपना फोकस बढ़ाया है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी पंजाब में अपने जनाधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
AAP का ‘सनातनी’ कार्ड
AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने अमृतसर के ऐतिहासिक राम तीर्थ स्थल पर 150 करोड़ रुपये की लागत से लव-कुश मंदिर बनाने का ऐलान किया है। पंजाब सरकार की ओर से भक्ति संध्याओं का आयोजन भी किया जा रहा है।
इसके अलावा पटियाला के काली माता मंदिर के लिए 80 करोड़ रुपये का आवंटन, श्रद्धालुओं के लिए मुफ्त तीर्थयात्रा योजना, मंदिर प्रबंधन से जुड़ा कानून और विभिन्न जाति कल्याण बोर्ड बनाने जैसे कदम भी उठाए गए हैं।
यह पहली बार नहीं है जब AAP ने हिंदू मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश की हो। दिल्ली चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने हनुमान चालीसा का पाठ किया था। इसके अलावा राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के दौरान दिल्ली में सुंदरकांड और रामचरितमानस पाठ के कार्यक्रम भी आयोजित किए गए थे।
पंजाब में हिंदू वोट का गणित
पंजाब में हिंदू आबादी करीब 38.5 फीसदी बताई गई है। इनमें बड़ी संख्या शहरी और कस्बाई इलाकों में रहती है। राज्य की 117 विधानसभा सीटों में करीब 34 सीटों पर हिंदू समुदाय सबसे बड़ा सामाजिक समूह है, जबकि लगभग 45 सीटें ऐसी हैं जहां हिंदू मतदाता चुनावी नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।
यही वजह है कि पंजाब में हिंदू वोट को किसी एक पार्टी का स्थायी वोट बैंक नहीं माना जाता। चुनाव दर चुनाव इस वर्ग का झुकाव बदलता रहा है।
BJP के लिए भी बढ़ी उम्मीद
पंजाब में BJP का वोट शेयर 2024 के लोकसभा चुनाव में बढ़कर 18.5 फीसदी हो गया था। 2019 में यह 9.63 फीसदी और 2022 के विधानसभा चुनाव में 6.6 फीसदी था। हालांकि 2024 में पार्टी कोई लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, लेकिन 117 विधानसभा सीटों में से 24 पर उसे बढ़त मिली थी। इनमें ज्यादातर शहरी सीटें थीं।
BJP को उम्मीद है कि शहरी इलाकों में अपना आधार मजबूत करके वह पंजाब की राजनीति में बड़ी भूमिका निभा सकती है। पार्टी के लिए चुनौती यह है कि पंजाब में उसका पारंपरिक आधार मुख्य रूप से शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच रहा है, जबकि राज्य की राजनीति में सिख और ग्रामीण वोट भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।
अकाली दल-BJP गठबंधन टूटने के बाद बदला समीकरण
1997 में BJP और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के बीच गठबंधन हुआ था। दोनों दलों के बीच लंबे समय तक वोटों और क्षेत्रों का एक तरह का बंटवारा रहा। अकाली दल ग्रामीण सिख वोटों पर मजबूत था, जबकि BJP को शहरी हिंदू मतदाताओं का समर्थन मिलता था।
2020 में दोनों दलों का गठबंधन टूट गया। इसके बाद पंजाब में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले और 2022 के विधानसभा चुनाव में AAP को शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच भी अच्छी बढ़त मिली।
बंगाल से क्यों जोड़ा जा रहा पंजाब?
BJP की नजर अब पंजाब में भी हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने पर है। पश्चिम बंगाल में पार्टी ने हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाकर मजबूत चुनौती खड़ी की थी। इसी वजह से पंजाब में भी इस तरह की रणनीति की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है।
हालांकि पंजाब का सामाजिक और राजनीतिक समीकरण पश्चिम बंगाल से काफी अलग है। इसलिए यह देखना अहम होगा कि धार्मिक और शहरी वोटों पर आधारित रणनीति 2027 के चुनाव में किस हद तक असर डालती है।


