दुनिया में तेजी से बढ़ रहे हैं खतरनाक उमस वाले दिन
जलवायु परिवर्तन का असर अब पहले से कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहा है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, 1970 के दशक के बाद दुनिया भर में खतरनाक गर्म और उमस वाले दिनों (Dangerous Humid Heat Days) की संख्या दोगुने से भी अधिक हो गई है। जहां 1970 के दशक में ऐसे दिनों का औसत करीब 10 दिन प्रति वर्ष था, वहीं 2016 से 2025 के बीच यह बढ़कर 23 दिन प्रति वर्ष हो गया है।
भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भी ऐसे दिनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 1970 के दशक में भारत में औसतन 101 खतरनाक उमस वाले दिन दर्ज होते थे, लेकिन 2016-2025 के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर 141 दिन प्रति वर्ष पहुंच गया। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।
क्या होता है खतरनाक उमस वाला दिन?
रिपोर्ट में बताया गया है कि जब वेट-बल्ब तापमान (Wet-Bulb Temperature) 25 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो जाता है, तब उसे खतरनाक उमस वाला दिन माना जाता है। इस स्थिति में शरीर पसीने के जरिए खुद को आसानी से ठंडा नहीं कर पाता, जिससे हीट एग्जॉशन, हीट स्ट्रोक और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
जलवायु परिवर्तन बना सबसे बड़ा कारण
रिपोर्ट में कहा गया है कि 1970 के बाद से दुनिया में दर्ज हुए लगभग 64 प्रतिशत खतरनाक उमस वाले दिनों के लिए मानव गतिविधियों से होने वाला जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है। वर्ष 2025 में दर्ज ऐसे 23 दिनों में से 19 दिन सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से जुड़े पाए गए।
किन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं, पहले से बीमार लोग और खुले में काम करने वाले मजदूर सबसे अधिक जोखिम में हैं। अधिक गर्मी और उमस के कारण शरीर का तापमान तेजी से बढ़ सकता है, जिससे समय पर इलाज न मिलने पर जान का खतरा भी हो सकता है।
बचाव के लिए क्या करें?
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अत्यधिक गर्म और उमस वाले दिनों में पर्याप्त पानी पीएं, दोपहर के समय धूप में निकलने से बचें, हल्के और सूती कपड़े पहनें तथा यदि चक्कर, तेज थकान या सांस लेने में परेशानी महसूस हो तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें। बढ़ती गर्मी और उमस से बचाव के लिए सरकारों और लोगों दोनों को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है।



