राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव के नतीजों में बीजेपी सबसे ज्यादा वार्ड जीतने वाली पार्टी बनी है, लेकिन वोट शेयर के आंकड़े तस्वीर को थोड़ा अलग तरीके से दिखाते हैं। बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोट प्रतिशत का अंतर 1 फीसदी से भी कम रहा, जबकि बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी जीत दर्ज की है।
10 हजार से ज्यादा वार्डों में हुआ मुकाबला
राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव में कुल 10,235 वार्डों के नतीजे घोषित किए गए हैं। इनमें बीजेपी ने 4,179 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को 3,613 वार्ड मिले। निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी 2,273 वार्ड जीतकर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। कुछ वार्डों के नतीजे EVM से जुड़ी वजहों के चलते रोके गए हैं।
नगर निगमों की बात करें तो राज्य की 10 नगर निगमों में बीजेपी चार जगह बहुमत तक पहुंची, जबकि कांग्रेस एक नगर निगम में बहुमत हासिल कर सकी। 47 नगर परिषदों में बीजेपी ने 12 और कांग्रेस ने 6 निकायों में स्पष्ट बहुमत पाया। वहीं 252 नगरपालिकाओं में बीजेपी को 70 और कांग्रेस को 39 जगह बहुमत मिला। बाकी जगह बोर्ड बनाने में निर्दलीयों और छोटे दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
वोट शेयर में दोनों पार्टियों के बीच कितना अंतर?
वार्ड जीतने में बीजेपी और कांग्रेस के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है, लेकिन कुल वोट प्रतिशत में दोनों पार्टियां काफी करीब हैं।
बीजेपी को कुल पड़े वोटों में 35.19 फीसदी वोट मिले, जबकि कांग्रेस का वोट शेयर 34.25 फीसदी रहा। यानी दोनों दलों के बीच सिर्फ 0.94 प्रतिशत अंक का अंतर है।
वहीं निर्दलीय उम्मीदवारों को 27.38 फीसदी वोट मिले। यानी करीब एक चौथाई वोट निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में गए। कई इलाकों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए मुकाबला मुश्किल बनाया।
कम वोट अंतर के बावजूद 566 वार्ड ज्यादा
चुनाव का एक अहम पहलू यह है कि वोट शेयर में अंतर भले ही 0.94 प्रतिशत अंक का रहा, लेकिन वार्ड जीतने के मामले में बीजेपी कांग्रेस से 566 वार्ड आगे रही। यानी दोनों दलों के कुल वोट प्रतिशत में ज्यादा अंतर नहीं था, लेकिन अलग-अलग वार्डों में वोटों का वितरण ऐसा रहा कि बीजेपी ज्यादा सीटें जीतने में सफल रही।
यही वजह है कि राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजों को केवल कुल वोट प्रतिशत के आधार पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। वार्ड स्तर पर वोटों का बंटवारा और निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी ने भी नतीजों को प्रभावित किया।
निर्दलीय उम्मीदवारों की बड़ी भूमिका
इस चुनाव में निर्दलीयों का प्रदर्शन खास तौर पर चर्चा में रहा। 2,273 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत और करीब 27 फीसदी वोट शेयर बताता है कि कई जगह मुकाबला सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के बीच नहीं रहा।
टिकट बंटवारे से नाराज पार्टी नेताओं और बागी उम्मीदवारों ने भी कई जगह निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ा। बारां नगर परिषद इसका एक उदाहरण रहा, जहां आम आदमी पार्टी ने जीत दर्ज की और कांग्रेस के पूर्व नगर परिषद सभापति कमल राठौड़ AAP के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में थे।
कई निकायों में अब बोर्ड बनाने के लिए बीजेपी और कांग्रेस को निर्दलीय या छोटे दलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन लेना पड़ सकता है।
भरतपुर और पाली में अलग तस्वीर
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह क्षेत्र भरतपुर में निर्दलीयों का प्रदर्शन खास रहा। 65 सदस्यीय भरतपुर नगर निगम में निर्दलीयों ने 36 वार्ड जीते, जबकि बीजेपी को 20 और कांग्रेस को 7 वार्ड मिले।
वहीं बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह क्षेत्र पाली में कांग्रेस ने 29 वार्ड जीते, जबकि बीजेपी को 21 और निर्दलीयों को 15 सीटें मिलीं। झालावाड़ नगर परिषद में भी कांग्रेस ने 29 वार्ड जीते, जबकि बीजेपी को 13 सीटें मिलीं।
परिसीमन को लेकर कांग्रेस का आरोप
कांग्रेस ने कुछ इलाकों में वार्डों के परिसीमन को लेकर सवाल उठाए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया कि वार्डों का पुनर्गठन बीजेपी के पक्ष में रहा। उनका दावा है कि अगर परिसीमन की प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से होती तो कांग्रेस बीजेपी से 1,500 ज्यादा वार्ड जीत सकती थी। यह कांग्रेस का राजनीतिक दावा है।
आरक्षित सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन
रिपोर्ट के मुताबिक SC और ST के लिए आरक्षित सीटों पर कांग्रेस ने बीजेपी से बेहतर प्रदर्शन किया। कांग्रेस ने इसे अपने चुनावी अभियान में भी मुद्दा बनाया। दूसरी तरफ बीजेपी ने संगठन और अपने वरिष्ठ नेताओं के प्रचार के जरिए चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की।
नतीजों से क्या तस्वीर बनती है?
राजस्थान निकाय चुनाव के आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखते हैं। बीजेपी ने सबसे ज्यादा वार्ड जीते हैं और कुल वोट शेयर में भी वह कांग्रेस से आगे है, लेकिन दोनों दलों के बीच वोट प्रतिशत का अंतर सिर्फ 0.94 प्रतिशत अंक है। दूसरी तरफ निर्दलीयों का करीब 27 फीसदी वोट शेयर और 2,273 वार्डों में जीत स्थानीय चुनावों में उनकी भूमिका को भी सामने लाती है।
इन नतीजों का एक और पहलू यह है कि कई निकायों में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में आने वाले दिनों में स्थानीय बोर्डों के गठन में निर्दलीय और छोटे दलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका अहम हो सकती है।


