वॉशिंगटन/तेहरान: लंबे समय से जारी तनाव और संघर्ष के बीच अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने स्विट्जरलैंड में उच्चस्तरीय वार्ता की, जहां मध्यस्थ देशों की मदद से शांति समझौते का रोडमैप तैयार किया गया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, वार्ता में युद्धविराम को मजबूत करने, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
ट्रंप की चेतावनी के बीच हुई बातचीत
शांति वार्ता के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी भी दी। ट्रंप ने कहा कि यदि ईरान रणनीतिक जलमार्ग होरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बाधित करता है या क्षेत्रीय तनाव बढ़ाता है तो अमेरिका सख्त कदम उठा सकता है।
ट्रंप के बयानों के कारण बातचीत के दौरान कुछ समय के लिए तनाव भी बढ़ा और ईरानी प्रतिनिधियों की नाराजगी की खबरें सामने आईं। हालांकि बाद में वार्ता प्रक्रिया जारी रही।
60 दिनों में अंतिम समझौते की तैयारी
मध्यस्थ देशों कतर और पाकिस्तान ने बताया कि दोनों पक्षों ने एक व्यापक शांति समझौते को अंतिम रूप देने के लिए 60 दिनों की रूपरेखा पर सहमति जताई है। इस दौरान कई संवेदनशील मुद्दों पर आगे बातचीत होगी।
सूत्रों के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते में क्षेत्रीय संघर्षों को कम करने, समुद्री व्यापार को सुरक्षित बनाने और भविष्य के कूटनीतिक संबंधों को बेहतर करने पर जोर दिया गया है।
तेल बाजार पर भी दिखा असर
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में प्रगति की खबरों के बाद वैश्विक तेल बाजार में राहत देखने को मिली। निवेशकों को उम्मीद है कि यदि होरमुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुला रहता है और तनाव कम होता है, तो कच्चे तेल की आपूर्ति बेहतर होगी और कीमतों पर दबाव कम पड़ेगा।
अभी कई मुद्दों पर सहमति बाकी
हालांकि शांति वार्ता में प्रगति हुई है, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई अहम मुद्दों पर अभी अंतिम सहमति बनना बाकी है। दोनों पक्षों ने आगे भी बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता सफल होता है तो इससे मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी अस्थिरता कम हो सकती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी राहत मिल सकती है।
निष्कर्ष
स्विट्जरलैंड में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता को मध्य पूर्व की राजनीति में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि अंतिम समझौता अभी बाकी है, लेकिन दोनों देशों के बीच संवाद जारी रहना क्षेत्रीय शांति और वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।



